मछुआ है
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हवाए दिशा बदलती है, बदलने दो
सिर हमारा कटता है . कटने दो रक्त जमी पर गिरता है, गिरने दो
"मछुआ" है, भावनाय न मरने दो .
जब चलेंगे टोली बनाकर पथ की ओर
थाम ही लेगा कोई लक्ष्य की डोर
पीढ़िया आश लगाय है, आशा न मिटने दो
मछुआ है,भावनाय न मरने दो
जो भय्क्रांत है, साहस का संचार कर दो
जो निर्जीव है, आत्मा का निर्माण कर दो
जो थक गए है.अब कदमो को चलने दो
मछुआ है , भावनाय न मरने दो
जब पैरो की थाप पड़ेगी.धरती दह्लेगी
जब कोटि हाथ उठेंगे. मूरत कह्केगी
दीये जलाओ सम्मान के.निषादराज को हसने दो
मछुआ है भावनाय न मरने दो
"सुरेश कुमार कश्यप"
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